शनिवार, 9 मई 2015

वो छोटी सी चिड़िया

वो एक चिड़िया जो मेरी छत पर रोज़ सुबह आती थी 
अब नहीं आती 
मेरी माँ के बिखेरे हुए चावल अब यूँही पड़े रहते है 
ची ची चू चू की आवाज़ भी सन्नाटे के गले मिल गयी है 
कोई खबर तो उसने दी नहीं 
न ही कोई चिठ्ठी भेजी 
पर वो तो चिड़िया है, ऐसा कैसे करती 
मेरे आँगन के उपरवाले एक कोने में 
आज भी उसके घोसले की दर-ओ-दीवार सलामत है 
बस वहां कोई रहता नहीं  
अब भी माँ को उसका इंतज़ार है 
कहती है 
उनके रहने से घर में हलचल सी रहती थी 
जैसे कोई छोटा सा बच्चा उदास नहीं होने देता 
होठो को मुस्कुराने के बहाने देता है 
पर मुझे नहीं पता 
वजह, कारण या जो भी हो 
बस उनके न होने का एहसास
मुझे भी पता चलता है 
वो गौरैया वो छोटी सी चिड़िया 
न जाने कितनी बड़ी जगह 
हमारी ज़िन्दगी में कायम कर गयी 
अब फिर न जाने कब दिखेगी 

तुम ...

तुम आते हो... मेरे करीब से होकर... 
मुझे छू कर... गुज़र से जाते हो...
जैसे एक हवा सी चली हो...
और मुझे एक सिहरन सी हुयी हो...
और मैं अब भी इस इंतज़ार में हूँ...
तुम लौट कर आओगे