शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

तुम्हारी आँखे


मैंने कल तुम्हारी आँखे देखी थी,
न जाने कैसी पर एक कहानी कहती थी,
दूर किसी पेड़ की डाल पर,
कल को अनजाना कहती थी,
दीवारों से आरपार खिड़की खोले,
किसी धूप की बात कहती थी,
जीते जीते कुछ साँसे लेते,
किसी धड़कन को धडकती थी,
झुकते उठते गिरते चलते,
थोडा सा मुस्काती थी,
मैं जी लूं, कुछ जी लूं,
एक इशारा करती थी,
अंधियारे में गुमसुम गुमसुम,
कोई खोया रस्ता तकती थी,
मिल जाते ही उन अंखियों से,
कुछ गुनगुनाया करती थी,
सचमुच ये खुली खुली सी आँखे,
कोई एक कहानी कहती थी....

3 टिप्‍पणियां:

shiwali gupta ने कहा…

wow sir..............aankhe humsa kuch na kuch na bolte he bas padhne wali aankho ke talash hote hai.................gud gud :)

Sunil Kumar ने कहा…

वाह वाह बहुत सुंदर अहसास मुबारक हो

simply mudita ने कहा…

umda... behad khoobsurat... ankhon ka itna sundar chitran to vahi kar sakta hai jisne un ankhon se dil me utar k dekha ho... :)